<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-5618368231537832734</id><updated>2011-12-01T06:54:44.604+05:30</updated><category term='विचार'/><category term='उम्मीद'/><category term='सोचिये'/><category term='सवाल'/><category term='जानिए.'/><category term='चिंतन'/><title type='text'>chintan</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>अमिताभ श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12224535816596336049</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_c0yASoeEE5k/TTxYDxYCgJI/AAAAAAAAAQ4/6oP9WOmKS8s/s220/28122010.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>12</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5618368231537832734.post-1072005775726854545</id><published>2011-03-09T22:48:00.000+05:30</published><updated>2011-03-09T22:49:17.147+05:30</updated><title type='text'>थैली के चट्टे-बट्टे</title><content type='html'>जितना अपने चुनावी दांव-पेंच और मतदाताओं को उल्लू बना सकने में गंभीरता अपनाई और दिमाग लगाया जाता है उतना यदि देश के लिये कांग्रेस सोचे तो सच में आश्चर्यजनक बदलाव देखने को मिल सकते हैं, किंतु अफसोस यही है कि कांग्रेस का हर नेता देश के लिये नहीं बल्कि अपने चुनावी और अपने गठबंधन को ध्यान में रखकर अपनी काबिलियत सोनिया गांधी के सामने बघारने की कोशिश करता रहता है। अफसोस यह भी है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के लिये भी बढिया नेता होने का मापदंड यही है कि उक्त नेता कांग्रेस को कितना फायदा पहुंचा सकता है और जब भी गठबंधन में कभी गडबड हो तो चुनाव जीतने तथा मतदाताओं को बेवकूफ बना सकने में वो कितना पारंगत है? कांग्रेस यहां तो हमेशा सोच समझकर, आगा-पीछा देख कर कदम उठाती है, मगर जब भी देश की बात आती है तो टालमटोली करती दिखती है, यहां तक कि उसका प्रधानमंत्री यह कह कर टाल जाता है कि उन्हें कुछ भी पता नहीं था। थॉमस मामले में यही हुआ। महंगाई हो, या बढता भ्रष्टाचार यूपीए की ऐसी कोई नीति अभी तक देखने को नहीं मिली है जो इस पर अंकुश लगा सके। यह विडंबना है इस देश की कि जनता भी कांग्रेस की इस कुचाल में फंस जाती है और वह देश में कोई बडा बदलाव लाने की फिक्र से ऐन वक़्त मुंह मोड लेती है। सच यह भी है कि कांग्रेस भारतीय जनमानस को अच्छी तरह से जानती-समझती है। यही वजह है कि उसके जाल में वो पार्टियां भी अपना हित साधने के लिये फंस जाती है जो आये दिन उसका विरोध करती रहती हैं। जैसा कि हाल ही में देखने को मिला जब पीएम ने माफी मांगी और विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने उन्हें माफ कर दिया। यह मामला सिर्फ माफी मांगने और माफी देने तक का ही था क्या? उधर डीएमके कल तक कांग्रेस से अपनी सीटों के बंटवारे में एकमुश्त शर्त की बात कर रहा था और सरकार से अलग हट जाने की बात ताल ठोंक कर दर्शा रहा था, किंतु अचानक सबकुछ तय हो गया और डीएमके कांग्रेस के साथ हाथ मिलाते नज़र आने लगी। उधर आप समाजवादी पार्टी का उदाहरण ले लीजिये, जब डीएमके ने अपना हाथ खींचने की बात कही तो इसका राजनीतिक फायदा उठाने के लिये मुलायम सिंह यादव ने झट से यह घोषणा कर दी कि वो यूपीए गठबंधन के साथ बने रहेगे और सरकार को किसी अनहोनी का सामना नहीं करना पडेगा। सपा की नीति, उसका कार्य और उसकी विचारमीमांसा रहस्यवादी है, शायद वो नहीं जानती कि स्वार्थगत राजनीति में अपना भविष्य तलाशने वाली पार्टियों को कभी न कभी मुंह की खानी ही पडती है। खैर, फिलहाल सपा ने जो सोचा था कि वो सोनिया गांधी की नज़रों में विश्वासपात्र बन जायेगी, डीएमके के राजी होने के बाद उसका भी कचरा हो गया है। दरअसल यह सब इसलिये होता है कि आज यूपीए गठबंधन की हर पार्टी किसी न किसी घोटाले या विवाद से दो हाथ कर रही है और अगर कांग्रेस से वो अलग हट जाती हैं तो उनका सत्यानाश अवश्य संभव है, लिहाज़ा खिसायाते हुए सब नतमस्तक होते रहते हैं और सोनिया गांधी को खुश करने में ही अपनी राजनीतिक भलाई मानते हैं। &lt;br /&gt;बहरहाल, कांग्रेस-द्रमुक का गतिरोध लगभग खत्म हो चुका है, इससे जयललिता को भी झटका लगा होगा जो यह सोच कर बैठ गईं थी कि अब इस गतिरोध का फायदा उन्हें अपने राज्य में जरूर मिलने वाला है। प्रणब मुखर्जी का दिमाग और उनका कांग्रेस के प्रति समर्पित जीवन ही ऐसा रामबाण है जो करुणानिधि को साध गया। यह सोनिया गांधी भी जानती थी कि ऐसे समय उनके पास तुरुप का इक्का प्रणब मुखर्जी के रूप में मौजूद है, इसलिये ही वे द्रमुक की हवाबाजी से चिंतित नहीं हुई। डीएमके ने कांग्रेस को 63 सीटे दे दी। पिछली बार उसके खाते में 48 सीटे थी, आप सोच सकते हैं कि जो भी सौदेबाजी हुई होगी वो कितनी उच्चस्तरीय रही होगी। करुणानिधि की पत्नी भी 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच दायरे में है और करुणानिधि चाहते हैं कि इस दायरे से उनकी पत्नी को दूर रखा जाये। मज़ेदार बात यह है कि यहां आपस में लडाई वो करते हैं जो खुद के गिरेबां में कलंकित है, और यह जानते हैं कि एकदूसरे की ही उन्हें जरुरत है। वे बस जनता को बेवकूफ बना सके और अपनी महत्ता को दर्शा सकने के लिये हाथ-पैर चलाते रहें, उनका यही परम कर्तव्य है। &lt;br /&gt;अब इस गतिरोध के बीच जयललिता को देखिये जिन्होंने कांग्रेस को अपने 9 सांसद देने की बात से राहत पहुंचाने का काम किया था। कांग्रेस जयललिता के फेंके जाल में फंस जाती मगर उसने देखा कि जयललिता ने अभिनेता विजयकांत की डीएमडीके को 41 सीटे दे रखी है तो उसे यह सौदेबाजी रास नहीं आई। 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस विजयकांत से हाथ मिलाती इसके पहले यह बाज़ी जयललिता ने मार ली थी, विजयकांत की पार्टी तमिलनाडु राजनीति में डीएमके और एआईडीएमके के बाद तीसरी सबसे बडी पार्टी के रूप में उभरी थी। ऐसे में कांग्रेस के पास उस वक्त डीएमके से जुडना लाचारी थी, अब चूंकि उसने देखा कि जयललिता के साथ अगर वह हाथ मिलाती है तो चुनाव में इसका खामियाजा उठाना पडेगा, क्योंकि उसके हाथ से डीएमके जैसे दूसरी बडी पार्टी छूट जायेगी, उधर जयललिता चाहती थी कि यदि वह कांग्रेस को पटा लेगी तो इस बार के विधानसभा चुनाव में फिर सत्ता पर आसानी से काबिज हो सकती है। किंतु कांग्रेस के लिये यह फायदेमंद सौदा नहीं था सो उसने डीएमके को पकडे रखा, डीएमके के लिये भी कांग्रेस को खोना उसकी अपनी नींद हराम होने जैसा ही था, एक तो वामपंथी पार्टियों ने उसका दामन छोड रखा है, दूसरे जयललिता ने स्थानीय पार्टियों को अपने खेमे में ले रखा है, डीएमके के लिये अकेले चुनाव लडना आसान भी नहीं था, सो थोडी हुडकी देने के बाद कांग्रेस को कांग्रेस की शर्तों पर सीटे दे दी, जब जयललिता ने यह प्रेम-मोहब्बत देखी तो वो फिर से कांग्रेस की दुश्मन पार्टी बन गई हैं। एक तरफ दोस्ती का हाथ बढाया जाता है और जब मामला करवट बदलता है तो झट से हाथ खींच लिया जाता है या हाथ मलते हुए मतदाताओं को रिझाने के लिये तर्कों-कुतर्कों का सहारा लिया जाने लगता है। राजनीति इसीको कहते हैं। मुलायम हो या जयललिता जैसे नेता सत्ता और सत्ता में बने रहकर अपने खिलाफ कोई मुहिम न चल पडे जैसी सोच के तहत कांग्रेस के आगे झुकते रहते हैं। आप यह भी देखिये कि कांग्रेस कितनी पारंगत है, कितनी मंझी हुई है कि वो तमाम विवाद के बावजूद हमेशा जीत हासिल करती है, इसका एकमात्र कारण यह है कि इस देश में उसका कोई मज़बूत विकल्प नहीं है। एक भारतीय जनता पार्टी है किंतु वो भी अपने स्थान पर अडिग रहने वाली नहीं है। उसकी करवटों से देश भलिभांति परिचित है। पहले राममंदिर का मुद्दा था तो जमकर वोट कबाड लिये गये, अब वो मुद्दा उनकी प्राथमिकता से हट गया है। इंडिया शायनिंग का गुब्बारा भी फुस्स हो चुका है और वे विपक्ष में आ बैठी। अब जब उसके पास ढेरों अवसर हैं तो उसे भुनाने में भी वो देश को अपने स्वार्थ से पीछे धकेल कर सोचती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सीवीसी के थॉमस मामले में लगभग फंस चुके थे और भाजपा ने जिस तरह से उसे प्रचारित करके अपनी छवि संसद में कठोर बनाई थी उसकी हवा पीएम की माफी मांग लेने से ही निकल गई। भाजपा में भी इस विचार के दो धडे हो गये हैं, सुषमा स्वराज के अचानक माफ कर देने वाले लहज़े को दूसरे कुछ नेता समझ नहीं पा रहे हैं। समझे भी कैसे जब आप किसी मुद्दे को देश के साथ जोडते हैं और संसद तक को ठप करके कार्यवाही चाहते हैं,तब अचानक उस मुद्दे को कैसे ठंडा किया जा सकता है? जबकि उसके लिये आपने देश के जनमानस तक को झंझोड कर रखा। क्या वो मुद्दा अपका निजी था? जो आपके माफ कर देने से खत्म हो गया? भाजपा ने इस मुद्दे को अंजाम अपनी स्वार्थगत राजनीति खेल कर दिया। कुलमिलाकर आज चल यही रहा है आप इस देश को, देशवासियों को किस तरह से चूना लगा कर उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड कर सकते हैं, उनकी आंखों में धूल झौंककर अपनी रोटियां सेंक सकते हैं। आप इसमे जितने निपुण हैं उतने ही सफल हैं। और बेचारे सामान्य देशवासी? उनके लिये रोज अखबार पढना, चैनल देखना और किसी चौपाल पर बैठकर राजनीति की बहस कर लेना, फिर उसी महंगाई, रोज-रोज की आपाधापी में ही जीवन गुजार देना भर है। दूसरी ओर तमाम दल एक थैली के चट्टे-बट्टे से अधिक कुछ नज़र नहीं आते।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5618368231537832734-1072005775726854545?l=aasheeamitabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/feeds/1072005775726854545/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2011/03/blog-post_09.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/1072005775726854545'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/1072005775726854545'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2011/03/blog-post_09.html' title='थैली के चट्टे-बट्टे'/><author><name>अमिताभ श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12224535816596336049</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' 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जाहिर की और मामले की तमाम जानकारी दी तब भी उनकी आंखे बंद क्यों रही? और जब सुप्रीम कोर्ट ने हंटर चलाया तब ही उन्हें अपनी जिम्मेदारी का अहसास क्यों हुआ? और क्या इस अहसास के बाद वे प्रायश्चित करेंगे? यदि करेंगे तो वो प्रायश्चित क्या होगा? जो भी होगा, किंतु यह सच है कि अगर विपक्ष या यह देश उन्हें सबसे अशक्त प्रधानमंत्री का तमगा देता है तो कोई गलती नहीं करता है। आप अगर मनमोहन सिंह को इसके बाद भी बेहतर प्रधानंमंत्री मानते हैं तो कम से कम अब आपको अपनी राय बदल लेनी चाहिये। &lt;br /&gt;दिलचस्प होगा यह जानना कि मनमोहन सिंह के इस कबूलनामे के बाद राजनीतिक परिदृष्य कैसा होगा? वैसे भी यूपीए सरकार के दिन गर्दिश में दिखाई दे रहे हैं उपर से उसके सबसे मज़बूत धडे करुणानिधि ने भी अपना समर्थन वापस लेने की बात कर दी है, उधर पहले ही कांग्रेस भ्रष्टाचार के दलदल से उबरने का असफल प्रयत्न कर रही है और एक के बाद एक कई खादीधारी कालेधन के जाल में फंसते नज़र आ रहे हैं। ऐसे कार्बनयुक्त माहौल में अब खुद मनमोहन सिंह के हाथ कालिख लगती हैं तो यकीनन यह कहा ही जा सकता है कि सरकार की दाल में काला ही नहीं बल्कि पूरी दाल काली है। &lt;br /&gt;बहरहाल, क्यों थॉमस को लेकर सरकार ने सीवीसी की गरिमा का ख्याल नहीं रखा? क्यों मनमोहन सिंह मौन रहे? और यदि अब जाकर उन्होंने जिम्मेदारी कबूली है तो इसकी सजा क्या है? जिम्मेदारी कबूलना ही यह साबित करता है कि मनमोहन सिंह पहले से जानते रहे हैं कि थॉमस नामक चीज क्या है? यानी देश को अंधेरे में रखा गया, क्यों रखा गया? ऐसे कितने ही सवाल अपनी तेज बौछारों के साथ प्रधानमंत्री के माथे पर ओले की तरह पड रहे हैं। सरकार ने जो काम किया है वह निस्संदेह शर्मनाक है, विपक्ष तो यह चाहेगा ही फिर भी जनमानस मानता है कि अगर प्रधानमंत्री में थोडी भी शर्म शेष है तो अपने पद से हट जाने की हिम्मत दिखाई जा सकती है, मगर सत्तालोभ और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी कांग्रेस के लिये यह संभव नहीं। वो तो शुक्र है कि हमारे देश में न्यायपलिका का इमानदाराना रौब चलता है अन्यथा देश का तो भगवान ही मालिक होता। जब राजा ही सो रहा हो तो उसके मंत्री-संत्री सब इसका फायदा उठाते हैं, थॉमस जिस दादागिरी के साथ अपने पद पर अडिग थे वो स्पष्ट करता है कि उनके सिर पर किसी बलवान का वरदहस्त था। और यह बलवान कौन? प्रधानमंत्री के अतिरिक्त और कौन हो सकता है? दिक्कत यह है कि अब वे ऐसा मान भी नहीं सकते कि वे कुछ नहीं जानते थे, या उन्हें समझने में देर लगी, या फिर वे किसी दबाव में थे। अफसोसजनक तो यह भी है कि 3 सितंबर 2010 से आज तक के इतने समय के बाद तथा इतने वाद-विवाद के बाद जब अदालत की फटकार लगती है तब उन्हें अपने फर्ज़ की याद आती है और वे अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करते हैं। पर हास्यस्पद यह भी है कि एक ओर सरकार कह रही है कि थॉमस हटाये जा चुके हैं किंतु अभी भी यह भ्रम कायम है (सरकार सोमवार को संसद में जवाब देने वाली है) क्योंकि थॉमस महोदय की ओर से अपने पद से इस्तीफे की बात अभी भी बाहर नहीं आई है। उन्होंने इस्तीफा दे दिया है, इसका कोई सबूत दिखाई नहीं दिया है यानी यह एक घिनौना मज़ाक नहीं तो क्या है? देश का सीधे सीधे मखौल उडाया जा रहा है, और अपनी दादागिरी व्यक्त की जा रही है, मानो थॉमस महोदय देश और देश की न्याय व्यवस्था से कोई उपर के आदमी हैं। ऐसे आदमी को तुरंत घसीटकर चौराहे पर लाकर फटकार लगाने की जरुरत होती है, किंतु ऐसा हो नहीं रहा। क्यों नहीं हो रहा? क्योंकि निश्चित रूप से थॉमस के पास कोई जादू की छडी है जिससे सरकार सहमी हुई है। थॉमस की नियुक्ति के नेपथ्य में यह तय है कि कोई बहुत बडा गेम छुपा है जो सरकार खेलने जा रही थी। पर देश का सौभाग्य है कि उसके लोकतंत्र के सबसे मज़बूत स्तंभ न्यायपालिका को डिगाना संभव नहीं है। &lt;br /&gt;केरल के 1990 में हुए पामोलीन आयात घोटाले के आरोपी हैं थॉमस। उनका दामन दागदार तो है ही साथ ही उन्हें तो किसी प्रकार की सतर्कता या जांच-पडताल का अनुभव भी नहीं है, जो किसी भी सीवीसी के करतार के लिये आवश्यक होता है, बावजूद उनकी नियुक्ति को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पी. चिदंबरम ने जल्दबाजी दिखाई साथ ही नियुक्ति के लिये गठित पैनल की तीसरी सदस्य सुषमा स्वराज की बार-बार मनाही को सिरे से खारिज करते हुए थॉमस की नियुक्ति पर ठप्पा लगा दिया गया। जिस व्यक्ति पर एफआईआर दाखिल हो, जिसकी जमानत विचारधीन हो, जिस पर भ्रष्टाचार का मामला चल रहा हो क्या उससे आप उम्मीद कर सकते हैं कि वो सीवीसी के तहत जो भी कार्य करेगा पाक-साफ करेगा? दरअसल यह सब 2 जी स्पेक्ट्रम जैसे बडे-बडे घोटाले पर पानी फेरने और देश को गुमराह करने की कवायद ज्यादा जान पडती है जो सरकार के भ्रष्ट रूप को दबा सके। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह सब आखिर क्यों किया? किसके दबाव में किया?  क्यों उन्होने देश को भुलावे में रखने का प्रयत्न क्या? और अब यदि उन्होंने अपनी जिम्मेदारी कबूली है तो वे इसका उदाहरण किस रूप में देंगे? क्या वे जानते हैं कि खुद को अगर वे इमानदाराना साबित करना चाहते है तो उन्हें पहले अपनी मजबुरी बयां करनी होगी, फिर अपने उपर पडे विशेष दबाव का खुलासा करना होगा। मगर विडंबना यह है कि ऐसा होगा नहीं, क्योंकि यदि ऐसा हुआ तो कांग्रेस का कचूमर निकल जायेगा। ऐसी कांग्रेस के पास हिम्मत नहीं कि वो देश के लिये अपना बलिदान दे सके,  इसका मतलब यह हुआ कि देश को अब नया खेल देखने को तैयार हो जाना चाहिये। आप यूपीए गठबंधन का कालिख लगा दामन किसी सर्फ एक्सेल से धुला हुआ देख सकते हैं। क्योंकि यह तय है कि सरकार अब थॉमस की जगह नये की नियुक्ति कर देगी और इस पूरे विवाद को पीछे छोड देगी। प्रधानमंत्री की ली गई जिम्मेदारी से उठे सवाल जैसे थे वैसे ही रखे रह जायेंगे और एकबार फिर देश की जनता किसी बडे सच से अनजान रह कर नये फेरे में अपनी नज़र गाढ लेगी। यह देश का दुर्भाग्य है। और इसे कांग्रेस अच्छी तरह से समझती है कि भारतीय लोगों को भूलने की आदत है, उन्हें आसानी से बेवकूफ बनाया जा सकता है। वैसे भी तुलसीदास की चौपाई चरितार्थ होती है कि " समरथ को नहिं दोष गुंसाई...।"&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5618368231537832734-6841305951608511893?l=aasheeamitabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/feeds/6841305951608511893/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2011/03/blog-post.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/6841305951608511893'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/6841305951608511893'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='वाह रे मनमोहना'/><author><name>अमिताभ श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12224535816596336049</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_c0yASoeEE5k/TTxYDxYCgJI/AAAAAAAAAQ4/6oP9WOmKS8s/s220/28122010.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5618368231537832734.post-519962586346294001</id><published>2010-11-16T16:58:00.000+05:30</published><updated>2010-11-16T17:00:38.531+05:30</updated><title type='text'>घोटालों के बीच गुम हो रहा सुदर्शन चक्र</title><content type='html'>पूर्व संघ सरसंचालक सुदर्शन के बयान के बाद मचा बवाल इस पूरे पखवाडे में घोटालो की भेंट चढ गया। वैसे भी सुदर्शन कह कर चुप थे और उधर सोनिया गान्धी ने तो अपना मुंह खोला ही नहीं था। सुदर्शन नहीं जानते थे कि संघ और भारतीय जनता पार्टी उनके बयान पर मुंह फेर लेगी। मगर सोनिया जानती थी कि उन्हें चुप रहना है क्योंकि उनके चाटुकार सैनिकों की फौज काफी है इस बयान, बवाल से निपटने के लिये। यह देश की विडंबना है कि जिसे सुदर्शन का साथ देना चाहिये था उसने अपना हित साधने के लिये होंठ सिल लिये। सुदर्शन का बयान झूठा या सच्चा जो भी हो..किंतु यह जांच का विषय होना ही चाहिये था। आपको क्या लगता है कि सुदर्शन कोई नासमझ व्यक्ति है जिन्होंने किसी पागलपन के दौरे में बयान दिया? क्या वे इस देश को सोनिया से कम जानते हैं या सिर्फ सोनिया ही त्याग की मूर्ति हैं सुदर्शन नहीं? सुदर्शन पढे-लिखे, बेहद सुलझे विचारों वाले और तमाम ऊंच-नीच को जानने-समझने वाले व्यक्ति हैं, सोनिया से ज्यादा...। लिहाज़ा उनके बयान को घोटालों की इस बाढ में बहने नहीं देना चाहिये था।  यह भी तो हो सकता है कि घोटालों की सनसनीखेज खबरें, सुदर्शन के आग उगलते बयान पर पानी का छींटा डालने का बेहतर षडयंत्र हो? आप कहेंगे अपने बयान के बाद सुदर्शन क्यों चुप हैं? आप यह क्यों नहीं कहते कि सोनिया क्यों चुप रही? वैसे उनको सलाम ठोंकने वाले सैनिकों का उत्तर होगा कि सोनिया फिज़ूल के आरोपों पर अपना मुंह क्यों खोलेगी। तो भाई आप सैनिक क्यों बक बक करते है? जब फिजुल है तो चुप ही रहा जाये न.., मामला अपने आप निपट जायेगा। किंतु इसके पीछे का खेल भी न्यारा है। यह ऐसे मुद्दे होते हैं जब सोनिया की नज़रों में आया जा सकता है। आप अपनी वफादारी अच्छी तरह से व्यक्त कर सकते हैं। लिहाज़ा सुदर्शन का बोलना हुआ नहीं था कि चारों ओर से उन्हें घेरने, उन्हें घसीटने, उन्हें खींचने का कांग्रेसी कॉमनवेल्थ शुरू हो गया था। इधर सुदर्शन चाहते तो होंगे कि संघ उनका साथ दे। यह ताज्जुब की बात है कि संघ ने उन्हें उनके निजी विचार बता कर उनसे किनारा कर लिया। भाजपा से वैसे भी कोई ज्यादा उम्मीद उन्हें नहीं थी क्योंकि भाजपाई सोच का और मुद्दों पर संघर्ष करने का ढंग बदल चुका है। हालांकि इस मुद्दे पर वो अगर अड जाती और बगैर किसी दबाव, बगैर किसी गलत प्रक्रिया के शुद्ध जांच की मांग करके, एक बार हो ही जाये वाली शैली में आ जाती तो उसे राजनैतिक फायदा जरूर होता साथ ही देश का भी फायदा हो जाता, और दूध का दूध पानी का पानी सामने आ जाता। मगर हर बार की तरह अफसोस कि इतने संवेदनशील बयान के बावज़ूद कोई सार्थक जांच नहीं हुई। आप सोच रहे होंगे कि मैं इतना उतावला क्यों हो रहा हूं इस बयान की तह में जाने के लिये? तो आपको बता दूं कि सोनिया के लिये सुदर्शन द्वारा व्यक्त किया गया बयान कोई नया नहीं था। इसके पहले भी इस तरह की बातें राजनीतिक चक्र में घूमी थीं, और घूम कर कहीं किसी दरार में छिप गई थीं। सुदर्शन ने उसे बाहर निकालने का साहस किया। आप बता सकते हैं सुदर्शन के इस साहस की पुनरावृत्ति कोई और कर सकता है क्या? वो कांग्रेसी नेता खुद भी नहीं जिसके वज़ूद पर सुदर्शन ने अपनी बात कही थी। वैसे कांग्रेसी नेताओं में वो जिगर है ही नहीं कि सोनिया के खिलाफ कुछ सोच भी सकें। यह उनकी अपनी मज़बूरी है। मेरा तो महज़ यह मानना है कि सुदर्शन जैसा व्यक्तित्व जिसने संघ जैसी विशाल राष्ट्रीय, राष्ट्रवादी संस्था को संभाला वो कोई नीचता जनक कार्य तो कभी नहीं कर सकता है, जिससे उनका मानमर्दन हो। तब उनका बयान सिवाय सुर्खियों तक सीमित रह जाये, या सिर्फ थोडे से बवाल में नष्ट हो जाये, देश की एक उच्च पदस्थ पार्टी की उच्च पदासीन अधिकारी के लिये भी ठीक नहीं। आखिर यह उनके अपने जमीर, ईमानदारी पर उठा सवाल है। और वह भी बहुत ज्यादा घातक। जवाब मिलना चाहिये था। &lt;br /&gt;खैर..। घोटालों की बाढ में इन दिनों कांग्रेस क्या और भाजपा क्या..सब के सब बह रहे हैं। एक दूसरे पर कीचड उछाल-उछाल राजनैतिक होली खेली जा रही है। जांच भी अवश्य होगी। किंतु कांग्रेस के लिये यह सुखद भी है क्योंकि अगर इन घोटालों की बाग़ड (खेत के किनारे खडी की जाने वाली घासफूस से बनी दीवार) तैयार नहीं की गई तो सोनिया पर उठे सवालों की लहलहाती फसल पर सबकी नज़र चली जा सकती है। इसलिये चाहे वो अशोक चव्हाण के आदर्श घोटाले की बात हो या रतन टाटा के बयान से उठे विवाद या फिर कॉमनवेल्थ के घोटालों की फेहरिस्त हो, सबकी सब मीडिया में अव्वल स्थान पर हो और सुदर्शन के बयान किसी रद्दी की टोकरी में पडे पुराने अखबार की तरह खत्म हो जाये..कांग्रेस की यह चाहत अवश्य रहेगी। खुदा जाने उसकी चाहतों में और क्या-क्या है? किंतु यह जरूर है कि किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति पर प्रतिष्ठित व्यक्ति द्वारा उठाई गई उंगली के लिये तीसरे अंपायर का निर्णय अगर दिया जाता तो मैच का रंग ज्यादा निखरता, उसका रोमांच बढता और सच्ची जीत सामने आती।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5618368231537832734-519962586346294001?l=aasheeamitabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/feeds/519962586346294001/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2010/11/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/519962586346294001'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/519962586346294001'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='घोटालों के बीच गुम हो रहा सुदर्शन चक्र'/><author><name>अमिताभ श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12224535816596336049</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_c0yASoeEE5k/TTxYDxYCgJI/AAAAAAAAAQ4/6oP9WOmKS8s/s220/28122010.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5618368231537832734.post-6295089298545709182</id><published>2010-10-27T00:41:00.000+05:30</published><updated>2010-10-27T00:43:37.753+05:30</updated><title type='text'>अरुधंति से सावधान</title><content type='html'>क्या अरुधंति राय जैसी बाइयों से देश को सावधान रहने की आवश्यकता नहीं है? खुद को अतिबुद्धिजीवी मानने वाली अरुधंति का विचार देश को बांटने वाला है, और यह पहला अवसर भी नहीं है कि बाई ने ऐसा कहा हो। समय-समय पर अरुधंति ने आग में घी डालने वाले बयान दिये हैं। अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब यह कत्तई नहीं होता है कि देश के बंटवारे या देश के हिस्से के विरोध में अपने बयान देकर चर्चा में बने रहने का मोह पूर्ण किया जाये। क्योंकि यह देश कोई मज़ाक नहीं है। इस देश की आज़ादी के लिये कइयों-कइयों ने अपना बलिदान दिया है। जी हां अरुधंतिजी कश्मीर भी इसी देश में है जिसके लिये आज भी हमारे देशभक्त अपने खून से उसे सींच रहे हैं, जिसे आपने भारत से अलग बताया है। अरुधंति का बयान महज़ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को महान कहलवाने और यह साबित कराने के लिये है कि दिखिये हम भारत में रहने के बावज़ूद भारत के खिलाफ बोलते हैं, और किसी की हिम्मत नहीं कि हमसे ऐंठ जाये। ऐसी बाइयां या ऐसे लोग पहले तो बयान देकर सुर्खियों में छा जाते हैं, फिर अपने बयान या अपने बचाव के लिये देश को भ्रमित करने वाले बयान देते हैं, प्रेस कांफ्रेंस लेते हैं और फिर सुर्खियां ढूंढते हैं। फिलवक्त अरुधंति को कानूनी पेंच में लेने की कवायद जारी है। लिया ही जाना चाहिये। कानून की जंजीरों में ऐसे विकृत मानसिकता वाले लोगों को बांधना ही चाहिये जो देश के सौहार्द के लिये खतरा हैं। &lt;br /&gt;क्या जानती हैं अरुधंति कश्मीर के बारे में? कश्मीरी पंडितों से पूछ कर देखें या फिर कश्मीर का इतिहास ईमानदराना होकर पढ लें। वैसे मैं जानता हूं कि अरुधंति जैसे लोग जिस परिवेश, जिस मानसिकता और जिस उद्देश्य के लिये जी रहे हैं उसमें दूसरों की सही राय या सही इतिहास या विशुद्ध भारतीय होकर कभी नहीं सोच सकते। उनकी रगों में विरोध और विवाद पैदा करने वाला ही खून दौडता नज़र आता है। अरुधंति राय की यह किस्मत है कि यह देश उन जैसे लोगों को फिज़ुल में महत्व दे देता है। शायद यही कारण है कि देश को ऐसे लोगों की बयानबाजी से कभी कभी बडी कीमत चुकानी पड जाती है। होना यह चाहिये कि हम अरुधंति जैसे लोगों को महत्व देना छोड दें। दूसरी बात यह है कि कश्मीर का इतिहास या भारत का इतिहास ठीक से पढा जाये। उसका अध्ययन किया जाये। अरुधंति को यह पता होगा कि हमारी संसद में सर्व सम्मति से पारित है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। अगर नहीं तो वे चाहें तो संयुक्त राष्ट्र महासभा में वी के कृष्णमेनन या एम सी छागला या फिर सरदार स्वर्ण सिंह जैसे महानुभावों की दलीलें देख-पढ लें कि कश्मीर किसका हिस्सा है? और यदि इतने से भी उनकी तथाकथित तीक्ष्ण बुद्धि में कश्मीर के प्रति ज़हर खत्म न हो तो प्राचीन भारतीय इतिहास की किताबें खरीद कर लायें और पढें कि कश्मीर किसके नक्शे में हमेशा विद्ममान है या नहीं? भारतीय इतिहास बताता है कि भारत में ईसा पूर्व (गौर से पढें अरुधंतिजी ईसा पूर्व) तीसरी शताब्दी से ही कश्मीर में एक समृद्ध नवपाषाण संस्कृति रही थी। और इस संस्कृति का जो महत्वपूर्ण स्थल मिला है वह है बुर्जहोम। यह आधुनिक श्रीनगर से ज्यादा दूर नहीं है। कहने का मतलब यह है कि मैं भारतीय इतिहास के नवपाषाण युगीन कश्मीर की बात कर रहा हूं। सिन्धु सभ्यता के विस्तार में जम्मू-कश्मीर के एक स्थल मांदा का नाम भी है जो अखनूर के निकट है। यह तो माना जायेगा न कि सिन्धु सभ्यता भारतीय इतिहास की सबसे मज़बूत सीढी है। चलिये 150 ईसवीं के भारत पर नज़र दौडा लीजिये। यह काल शक, कुषाण, सातवाहन का काल माना जाता है। अरुधंतिजी कनिष्क को जानती हैं? कुषाण वंश का तीसरा शासक कनिष्क। कनिष्क को इतिहासकारों ने कुषाण वंश का महानतम शासक माना है। उसका राज्यारोहण का काल 78 से 105 ईसवीं के बीच में अलग अलग इतिहासकारों ने माना है। जो भी हो कनिष्क के राज्यारोहण के समय कुषाण साम्राज्य में अफगानिस्तान, सिन्ध, बैक्ट्रिया व पार्शिया के प्रदेश शामिल थे। कनिष्क ने भारत में अपना राज्य विस्तार मगध तक फैलाया था और कश्मीर को तो उसने अपने राज्य में मिलाकर वहां एक नगर ही बसा लिया था जिसका नाम था कनिष्कपुर। यानी कश्मीर कनिष्क के शासनकाल के समय तो था ही यह ऐतिहासिक तथ्य है। इसके भी पहले प्राचीनतम या वैदिक कालीन इतिहास को अगर अरुधंतिजी मानती हो तो वह भी उठाकर पढ सकती हैं कि कश्मीर भारतवर्ष के नक्शे में रहा है। वे ललितादित्य के शासनकाल पर नज़र डाल सकती हैं या रणजीत सिंह के इतिहास को खंगाल कर देख लें कि कश्मीर कहां था? अरे हमारे पुराण कश्मीर की गवाही देते हैं। इसका नामकरण तो कश्यप मुनि के नाम पर हुआ माना जाता है। फिर कैसे अरुधंति राय को कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं लगता? खैर..यहां मैं साफ-साफ कह देना चाहता हूं कि मैं अरुधंति को समझाने की चेष्ठा कत्तई नहीं कर रहा, वे महान हैं..। मैं अपने भारत के इतिहास को संक्षिप्त में दर्शा कर अपने देशभक्त लोगों के सामने फिर से रख रहा हूं। मुगलों ने भारत पर काफी लम्बा राज किया, यह माना ही नहीं बल्कि लिखा भी गया है। मुगल शासको में कश्मीर किसी जन्नत से कम नहीं था। जहांगीर हो या शाहजांह भारत के इस बेमिसाल स्थान कश्मीर को विशेष प्रेम करते थे। आधुनिक भारतीय इतिहास की परतों पर तो कश्मीर स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। चाहे आप महाराजा गुलाब सिंह को ले लें या महाराजा हरिसिंह के इतिहास को खंगाल लें..क्या ये किसी विदेश में शासन करते रहे? अजी ज्यादा दूर क्यों जाते हैं..हरिसिंह के बेटे कर्ण सिंह से तो पूछ कर भी देखा जा सकता है कि कश्मीर भारत का हिस्सा है या नहीं? &lt;br /&gt;अरुधंति का यह बयान था ही कि एक अन्य महाशय का बयान भी अरुधंति के बयान को बल दे गया। दिलीप पाडगांवकर का। इन महानुभाव ने कश्मीर समस्या के समाधान के लिये पाकिस्तान को शामिल करके ही हल निकल सकता है, जैसी बात कही। मानों इन्हें यह अधिकार दिया हो कि भाई दिलीपजी आप जो कहेंगे वही मान्य होगा। सिर्फ एक वार्ताकार के रूप में दिलीपजी को भेजा गया था। भाईजान ने हल ही खोज निकाला। कश्मीर का मसला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुलझाने का मतलब क्या है? वो हमारा है, हम सोचने में समर्थ हैं कि किससे, कब और कैसी बातचीत करनी होगी? विडंबना यह है कि हमारे इतिहास में गद्दारों का भी एक इतिहास है। इनकी बडी फौज रही है, जिन्होने समय-समय पर भारत को आघात पहुंचाया है। चाहे वो जयचंद के रूप में हो या रानी लक्ष्मीबाई के समय, गद्दारों ने इतिहास के प्रत्येक कालखंड में भारत की संप्रभुता पर वार किया है। और अफसोस कि इसी वजह से हम मज़बूत नहीं बन सके। गद्दारों का इतिहास दफ्न नहीं हो सका है। किंतु हां, आज हम इतने समझदार तो हो गये हैं कि गद्दारों को पहचान सकते हैं। समय यही है कि सबकुछ सरकार ही निपटेगी जैसा विचार त्याग कर हमें अपने धर्म, अपने कर्तव्य को पहचानते हुए भारत को मज़बूत व एकजुट रखने के लिये आगे बढना ही होगा। अन्यथा इसकी कीमत भयावह होगी यह तय है, जो हम सबको भुगतनी ही होगी। भारत कश्मीर से कन्याकुमारी और अटक से कटक तक एक है..कहने में ही नहीं इसे स्वीकारने का गर्व भी महसूस करना चाहिये।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5618368231537832734-6295089298545709182?l=aasheeamitabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/feeds/6295089298545709182/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2010/10/blog-post_27.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/6295089298545709182'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/6295089298545709182'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2010/10/blog-post_27.html' title='अरुधंति से सावधान'/><author><name>अमिताभ श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12224535816596336049</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_c0yASoeEE5k/TTxYDxYCgJI/AAAAAAAAAQ4/6oP9WOmKS8s/s220/28122010.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5618368231537832734.post-6962457713248740900</id><published>2010-10-25T20:51:00.000+05:30</published><updated>2010-10-25T20:52:41.825+05:30</updated><title type='text'>अमर ख्वाब</title><content type='html'>हालात आदमी को क्या से क्या बना देते हैं, यहां तक कि उसकी सोच और उसका विश्वास भी बदल जाता है। कल तक जो राजनीतिक मंच पर चमकता हुआ दिखता था, जिसकी बातों में सच्चाई भले न हो किंतु रस टपकता था, आज वो अपनी साख बचाये रखने तथा अपने आप को खडा रख पाने की जद्दोजहद में लगा है। हालात हैं। समाजवादी पार्टी से विलग कर दिये गये अमर सिंह ने लोकमंच नामक पार्टी का गठन किया था, इस गठन के वक़्त जितना शोर शराबा था वो धीरे-धीरे लगभग खत्म सा हो गया और अमर सिंह भी राजनीतिक हाशिये पर खडे दिखाई देने लगे। उनकी बातों में वो तेवर भी तैरते हुए किनारे लगने लगे जिनके दम पर अमर बाबु विख्यात थे। वैसे तो राजनीति एक ऐसा मंच है जहां सबकुछ डिस्काउंट में होता है। आपको जो बोलना है बोल दीजिये और दूसरे दिन उसका खंडन भी कर दीजिये..या अपनी बात से बिल्कुल मुंह फेर लीजिये, या फिर अडे रहिये और खडे रह कर तमाशा देखिये। सबकुछ छूट है। इस छूट का फायदा भी अमर सिंह ने खूब उठाया था। इन दिनों वे आत्ममंथन के दौर से गुजर रहे हैं शायद। क्योंकि उनके मुंह से निकलने वाले बयान कुछ इस तरह है कि "छोडो कल की बातें..कल की बात पुरानी...", अभी पिछले ही दिनों मुम्बई के अन्धेरी में उनकी प्रेसवार्ता हुई। अपने को पाकसाफ रखने की पुरानी आदत तो थी ही साथ ही मुम्बई में लोकमंच को यहां की दो सशक्त पार्टियों के साथ खडा करने की उनकी प्रेमभरी मंशा भी दिखाई दी। कभी शिवसेना या राज ठाकरे के खिलाफ बोलने वाले अमर सिंह आज उनसे दोस्ताना चाहते हैं। कारण स्पष्ट है..लोकमंच को मुम्बई में स्थापित होना है तो उसे शिवसेना और मनसे से मोहब्बत रखनी ही होगी। हालांकि अमर जितना भी चाह लें इन पार्टियों से उनका रिश्ता कभी पटरी पर बैठ नहीं सकता किंतु कोशिश जारी है। जो कभी अपने उत्तर-प्रदेश को विकास मार्ग पर ला कर खडा कर देने की बात करते थे आज वो ही कह रहे हैं कि उत्तरप्रदेश के पिछडने का कारण मायावती और मुलायम सिंह हैं। खैर..मुम्बई या महाराष्ट्र के विकास के मुद्दे पर उनकी वाणी में अब भारतीयता समाहित हो गई है। यहां तक कि उन्होने अपनी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जनार्दन सिंह को हटा कर मराठी मानुस सुभाष बोंडे को नया प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है। साथ ही उन्होने अपनी गलती भी स्वीकार कर ली कि मैं लाठी, फरसा जैसी रैली करने की बात नहीं करुंगा। कुलमिलाकर अमर सिंह पूरी तरह गांधीवादी के रूप में प्रकट होना चाहते हैं। और अपने पैरों को महाराष्ट्र में जमाना चाहते हैं। महाराष्ट्र में जमाने के पीछे भी कई सारे कारण हैं.., सपा से अलग होने के बाद बहुत से राजनीतिक सम्बन्ध भी टूटे हैं और पार्टी के आर्थिक तौर से भी वे पहले की तरह मजबूत नहीं रह गये हैं। बहरहाल, बीमारी के बावजूद वे 400 किलोमीटर की पदयात्रा करने वाले हैं। अलग पूर्वांचल की मांग को लेकर वे जनसमर्थन जुटाने वाले हैं। और इसके बाद वे विदर्भ की ओर नज़र करेंगे। उनका ख्वाब है कि इस तरह से वे अपनी खोई पहचान पुनः प्राप्त कर सकेंगे। किंतु जानकार मानते हैं कि अमर सिंह को पुनः खडे होने में वर्षों लग जायेंगे। मुम्बई जैसे महानगर में तो बस वे महज़ प्रेस कांफ्रेंस ही ले सकते हैं। रही बात उत्तरप्रदेश की तो यह सच है कि उत्तरप्रदेश में आज भी बहुत से हैं जो अमर सिंह के पक्ष को मज़बूत बनाते हैं। यह भी तय दिखता है कि अमर सिंह मायावती और मुलायम दोनों के लिये कांटे की तरह सबित हो सकते हैं, मगर यह तब जब अमर सिंह का आन्दोलन लगातार जारी रहे..। वे लगातार अपने लोगों के सम्पर्क में रहें और जनसमर्थन जुटाने की अलग-अलग विधियां आजमाते रहें। किंतु विदर्भ के रास्ते से वे सफल होना चाहेंगे तो..मुमकिन नहीं लगता कि उनका ख्वाब पूरा हो। अब वे जानें..उनकी रसभरी बातें जानें...। वैसे भी बिग बॉस में जाने की इच्छा और अगले जन्म में पत्रकार बनने की इच्छा उनके लुआबभरे वचन है जिनसे वे चर्चा में बने रह सकते हैं। तो इस अमर ख्वाब की नई गाथा देखने के दिन शुरू हो गये लगते हैं। आपको क्या लगता है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5618368231537832734-6962457713248740900?l=aasheeamitabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/feeds/6962457713248740900/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2010/10/blog-post_25.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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इसमे दो पाकिस्तानी कलाकारों को लेकर महाराष्ट्र की दो पार्टियों नें विरोध प्रदर्शन किया। इसके पहले भी ऐसा हो चुका है जब पाकिस्तानी कलाकारों के खिलाफ प्रदर्शन हुए हैं। विरोध प्रदर्शन कानून रोक देता है। वो रुक जाता है। मगर पाकिस्तानी कलाकारों का आना बद्स्तूर जारी है। इस मुद्दे पर बहस-मुबाहस भी काफी हो चुकी है। और अब सबके मुंह बक बक करके थक से गये हैं। किंतु निष्कर्ष नहीं निकला कि क्या सही है और क्या गलत? मैं फिर से यह मुद्दा उछाल रहा हूं और यह खोजने की कोशिश कर रहा हूं कि आखिर सही कौन है? वो जो पाकिस्तान से कलाकार आयात कर रहे हैं या वे जो इसका विरोध कर रहे हैं या फिर वे लोग जो बक-बक कर अपनी रोटियां सेंक रहे हैं? हालांकि लब्बोलुआब यही है कि सबके धन्धे चल रहे हैं। किंतु बावज़ूद इसके..कुछ तो है जो नहीं होना चाहिये। वो क्या नहीं होना चाहिये? शुद्ध भारतीय मानसिकता की नज़र तो यही कहती है कि हमे पाकिस्तान से किसी कलाकार को आमंत्रित नहीं करना चाहिये। क्यों? क्योंकि पाकिस्तान में भारतीय कलाकारों पर अघोषित बैन हैं। क्योंकि पाकिस्तान भारत की रीढ में घुस कर हमला करने की मानसिकता रखता है। क्योंकि आज के ऐसे हालात नहीं हैं जो इन दो देशों के बीच किसी गैरराजनीतिक तरीकों से दोस्ती का तर्क दे सकते हों। क्योंकि हम ही इतने उतावले क्यों होते रहें? अब कलाकारों को इस लिहाज़ में शामिल नहीं करना चाहिये, ये दलीलें होती हैं। किसकी? कलाकारों की, कुछ राजनीतिक दलों की, कुछ अति बुद्धिजीवियों की..। सोचिये यदि हम घोषित तौर पर बैन लगा देते हैं तो क्या बिगड जायेगा? वोट बैंक। दुनिया को दिखाया जाने वाला ढोंग। राजनीतिक पार्टियों का संतुलन। रीयलीटी शो वालों का हिसाब-किताब। न्यूज चैनल वालों की टीआरपी। और यह सब बाज़ार को प्रभावित कर देने वाला होगा। आइये अब पाकिस्तान पर नज़र करें- विस्फोटों और आतंक से लगभग बदहाल हो चुके इस देश में कला, संस्कृति, खेल आदि की वाट लगी हुई है। ऐसे में भारतीय कलाकारों के जरिये वे लाखों-करोडों के वारे-न्यारे कर सकते हैं, बिगडी हुई अर्थ व्यवस्था को पटरी पर ला सकते हैं..किंतु कट्टरता ऐसी है कि भारत से नफरत उनकी नसों में व्याप्त है। भूखे मरने की कगार वाले कलाकारों को अगर दुनिया में कोई पूछने वाला देश है तो वो भारत है..। बावज़ूद नमकहलाली की मानसिकता से परे पाकिस्तान में भारत..जानी दुश्मन की तरह है। इसलिये भारतीय कलाकारों, खिलाडियों या किसी शो-वो वाले माध्यमों पर वहां स्वचलित बैन है। अब लौट आइये अपने देश, हमारी क्या मजबूरी? क्या महज़ इस बाबत हम पाकिस्तानी कलाकारों को दूर रखें कि वहां हमारे कलाकारों के साथ सही बर्ताव नहीं होता या पाकिस्तान हमारे देश में आतंक फैलाने वाला देश है तो आखिर इसमे हर्ज़ ही क्या है? किंतु कमाई में हर्ज़ है। तो क्या सिर्फ कमाई के लिहाज़ से हम अपनी भावनाओं का कत्ल कर दें? &lt;br /&gt;हां, यह भी मजेदार है जैसा कि हाल ही में बिग बॉस से बेघर हुई पाकिस्तानी कलाकार बेगम ने खुद को शांति दूत की तरह पेश किया। यानी शांति दूत की तरह आते हैं कलाकार। पर यह तो तब सम्भव है जब इन तथाकथित दूतों को वहां की सरकार कायदे से दूत बनाकर भेजती। भारत की ज़मीन पर शांति के दूत की बातें..क्या कमाई का हथकंडा नहीं लगता? अगर शांति की इतनी ही इमानदारी है तो पाकिस्तान में कभी ऐसा नज़ारा क्यों नहीं देखने मिलता कि वहां के तमाम कलाकार एकजुट होकर बैनर लेकर निकल पडे हो सडकों पर कि हमे भारत से प्यार है..शांति चाहिये। भाई, अपनी बुद्धि इस मसले पर कुछ समझ ही नहीं पाती है। और खोजने की कोशिश हर बार यहीं आकर टिक जाती हैं कि आखिर ये क्या लगा रखा है कि पाकिस्तान से कलाकार बुलाये जा रहे हैं? हमारे यहां कम पड गये हों ऐसा भी नहीं। अब आप सुझाइये..सही क्या है? क्योंकि फिलवक्त मुझे कई नज़रियों से अपना यही तर्क सही लग रहा है..। पर ऐसा भी कतई नहीं है कि आपका तर्क मैं टीवी शो वालों की तरह काटूं, या विवाद पैदा करूं। मैं कोई राजनीतिक पार्टी वाला बन्दा नहीं, न ही अतिबुद्धिजीवी वाला प्राणी। अदना सा दिमाग है दौड रहा है। सोच रहा है। बस्स।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5618368231537832734-5440506977106325111?l=aasheeamitabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/feeds/5440506977106325111/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2010/10/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/5440506977106325111'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/5440506977106325111'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='कलाकार यानी?'/><author><name>अमिताभ श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12224535816596336049</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_c0yASoeEE5k/TTxYDxYCgJI/AAAAAAAAAQ4/6oP9WOmKS8s/s220/28122010.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5618368231537832734.post-4133953576022107909</id><published>2010-07-12T22:46:00.000+05:30</published><updated>2010-07-12T22:48:19.160+05:30</updated><title type='text'>यह कैसा इतिहास?</title><content type='html'>इतिहास कैसा होना चाहिये? सत्य पर आधारित। और सत्य? कम से कम गोरों द्वारा दिये गये सत्य जैसा तो नहीं। क्योंकि गोरों ने हमारे इतिहास से काफी छेडखानी की है, नफरत के बीज बोये हैं, जो उनके खून में है। उनके गन्दे खून का भी एक इतिहास है। खैर, इन दिनों महाराष्ट्र में एक किताब पर बवाल मचा हुआ है। जेम्स लेन नामक एक कथित इतिहासकार हैं जिन्होंने शिवाजी महाराज पर एक किताब रची है ' शिवाजी-हिन्दू किंग इन इस्लामिक इंडिया' नामक। किताब मैने पढी नहीं है, पढना भी नहीं चाहता। क्योंकि उसके जितने प्रचारित या प्रसारित अंश पढे है वे तमाम, किसी भी सत्य से कोसो दूर हैं। यह विडम्बना है कि हमने अपने इतिहास के लिये हमेशा से ही गोरों की बातों पर विश्वास किया। हमारे इतिहासकार भी हुए किंतु अधिकांश सहमति गोरों की बातों से दर्शाई गई। क्यों? क्या हमारे इतिहासवेत्ता लायक नहीं या उनकी बातें गलत हैं? ऐसा कुछ भी नहीं है, यदि हम पी एन ओक जैसे इतिहासकारों को आज मान्यता देते तो सम्भव था इन गोरों द्वारा समय-समय पर जिस तरह से जनमानस को भडकाने का षडयंत्र चला आ रहा है वो बन्द हो जाता। ग्रांट डफ जैसे इतिहासकारों को हमने अपने दस्तावेजों मे तरजीह दे दी मगर ओक को क्यों नहीं? &lt;br /&gt;इस विषय पर तर्क-वितर्क होगा। हास्यास्पद तो वो है जो लेन की किताब की तरफदारी करेगा। मैं लेन की तरफदारी क्यों नहीं करता? आपको बता दूं कि इतिहास का छात्र रहा हूं। भारतीय इतिहास से लेकर यूरोपीय इतिहास का गम्भीर अध्ययन किया हुआ है। हां पीएचडी नहीं है तो इसका मतलब यह भी नहीं कि बन्दे ने रिसर्च जैसा कुछ किया ही नहीं। ढेरों इतिहासकारों को पढा, कई-कई जगह खुद गया और जानकारियां ली। बहस-मुबाहस भी खूब की। और हमेशा अपने इतिहासकारों की बातों को यकीन के करीब पाया। खासकर पी एन ओक जैसे। जदुनाथ सरकार, जी एस सरदेसाई, एम जी रानाडे जैसों ने भारत के सन्दर्भ में काफी सच्चा अध्ययन किया है। यदि ग्रांट डफ जैसे ने शिवाजी द्वारा अफज़ल खां &lt;br /&gt;के खिलाफ विश्वासघात का आरोप लगाया तो रानाडे ने अपनी पुस्तक' राइज आफ द मराठा' में इसका बहुत सटिक जवाब दिया है। खैर..मैं कहना यह चाह रहा हूं कि जेम्स लेन बाजारवाद का इतिहासकर्ता है। उसकी किताब किसी प्रकार के अध्ययन या रिसर्च का नतीज़ा नहीं है बल्कि बाज़ार द्वारा प्रायोजित भारत के जनमानस को भडकाने का कृत्य है। लेकिन फिलहाल न्याय के क्षेत्र में लेन की किताब की लाइन क्लीयर है। आपको बता दूं और यह तमाम इतिहासवेत्ता जानते हैं कि शिवाजी महाराज द्वारा मराठा राज्य की स्थापना की सम सामयिक स्त्रोत सामग्री व अभिलेखों के पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होने के कारण उनके प्रशासनिक आदर्शों व परम्पराओं का अनुमान लगाना कठिन है। यूरोपीय स्त्रोत व फारसी इतिवृत्तों से भी इस सम्बन्ध में पर्याप्त सूचना प्राप्त नहीं होती तथा मराठी अभिलेख अधिकतर परवर्ती काल से संबद्ध है। अब रही उत्तरकालीन प्रशासनिक पद्धति से अनुमान की बात, तो इसी के आधार पर शिवाजी के जीवनकाल की घटानाओं का अनुमानभर लगाया गया है। इसमें भी भारतीय इतिहासकार ज्यादा करीब माने गये हैं क्योंकि उन्होंने जमीन से जुडी जानकारियां प्राप्त की और विदेशी इतिहासकारों ने सुनी सुनाई बातों को अपने ढंग से मोडने का काम किया। अब जेम्स लेन को कोई नया तीर मारना था सो महाराष्ट्र में देवतुल्य पूजनीय समझे जाने वाले शिवाजी महाराज के खिलाफ आग उगली ताकि बवाल हो और उसकी किताब धडल्ले से बिके। मोटी कमाई हो। मेरा मानना है इतिहास जो रहा, वो रहा..आज क्या है? जो राज्य शिवाजी के नाम से गर्व अनुभव करता है, सिर्फ राज्य नहीं पूरा भारतवर्ष, और इसके साथ ही उस राज्य की आस्था भी जुडी है तो इसे भंग करने का दुस्साहस कतई नहीं किया जाना चाहिये। यह अपराध है। आप किसी इतिहास को, ऐसा इतिहास को जो जनमानस में घर कर गया हो, जिससे दिशायें प्रवाहित होती हैं, जिससे प्रेरणा का सूत्रपात होता है उसे किसी भी प्रकार के तथ्यों का प्रभावी जामा पहना कर सत्य को झुठलाने का प्रयास करते हैं तो यह आपका अतुलनीय कार्य नहीं बल्कि घोर अपराध है? जेम्स लेन को विद्वान मानने से में इंकार करता हूं। उसकी विद्वत्ता गोरों की मानसिकता का परिचायक हैं। कम से कम आप तो इस सच्चाई को पूरी ईमानदार तरीके से स्वीकार कीजिये। तर्क-वितर्क तो बहुत हो जायेंगे। मगर अपने देश के लिये यदि अन्धभक्ति भी हो तो क्या गलत है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5618368231537832734-4133953576022107909?l=aasheeamitabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/feeds/4133953576022107909/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2010/07/blog-post_12.html#comment-form' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/4133953576022107909'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/4133953576022107909'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2010/07/blog-post_12.html' title='यह कैसा इतिहास?'/><author><name>अमिताभ श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12224535816596336049</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_c0yASoeEE5k/TTxYDxYCgJI/AAAAAAAAAQ4/6oP9WOmKS8s/s220/28122010.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5618368231537832734.post-2211118020141580083</id><published>2010-07-04T19:14:00.001+05:30</published><updated>2010-07-05T00:19:13.393+05:30</updated><title type='text'>है हिम्मत? नहीं न।</title><content type='html'>Small price paid today, will reap big benifits tomorrow. "BHARAT BANDH IS NOT A SOLUTION"  &lt;br /&gt;यह विज्ञापन है भारत सरकार के पैट्रोलियम और गैस मंत्रालय का। और इधर तमाम राजनीतिक पार्टियों द्वारा भारत बन्द का आवाहन भी। आप भूल जाइये कि आपका कुछ भला होने वाला है। बन्द एक ताक़त के रूप मे इस्तमाल करने वाला हथियार है और जब उस बन्द के जवाब में सरकार ही यह पत्थर की लक़ीर वाला फैसला ले ले तो बताइये आपके बन्द का मतलब क्या? आप कौनसी और किसको अपनी ताक़त दिखा रहे हैं? और यह ताक़त दिखा कौन रहा है? एक राजनीतिक पार्टी कीमतें बढा रही है, दूसरी पार्टी उसका विरोध कर रही है। जनता सिर्फ और सिर्फ दोनों की गतिविधियों को ताक़ रही है। इसमे कौन किसका भला कर रहा है? दिमाग पर जोर डाल कर देखें तो बन्द महज़ एक नाटक है। या नाटक बन कर रह जाने वाला है क्योकि इसमे जनता का कोई योगदान दिख रहा है, बिल्कुल नहीं लगता। पार्टियां बन्द करा रही है। पार्टियों के अपने कार्यकर्ता हैं वे सडक पर उतरे हैं या उतरेंगे..जनता तमाशा देख रही है, कभी बन्द को कोसती है कभी सत्ता को। अफसोस यह है कि जनता सडक पर उतरने की हिम्मत नहीं दिखाती। और यही वजह है कि जब बन्द का आवाहन होता है तो सरकार एक दिन पूर्व तमाम अखबारो आदि में विज्ञापित कर देती है कि हम मानने वाले नहीं है, विरोध फिज़ूल है। बताइये जब वो मानना ही नहीं चाहती तो आपकी पार्टी आखिर क्या बिगाड लेगी? यही न कि जनता के सामने जनता के लिये लडने का प्रदर्शन होगा और इस प्रदर्शन के बाद सरकार फिर कोई तुनतुना जनता को पकडा देगी, जनता फिर चुप। पार्टियों के अपने अपने काम बन जायेंगे। बस्स....। मुद्दा सिर्फ महंगाई का नहीं है। आज जनता के सामने ढेर सारी समस्यायें हैं और यकीन मानिये एक भी समस्या हल होती नहीं दिखती। दिखता है राजनितिक दंगल। आप जानते हैं यह सब क्यों होता है, आप जानते हैं कि यह सब इसलिये होता है क्योंकि आपमें ताक़त नहीं है लडने की। संघर्ष करने की। आपको बैठे बैठे सब मिल जाये या बैठे बैठे समस्यायें हल हो जाये, यही चाहिये, और यही चाहत सत्ता में बैठे या विरोध में बैठे राजनैतिक कलाकारो की ढाल है। खुद मूर्ख बनते कैसे हैं यह भारत की जनता से अच्छा उदाहरण कहीं ओर देखने में नहीं आयेगा। देखने में आयेगा, बन्द, पुलिसिया लाठी चार्ज, सरकारी बयान, विरोधी पार्टियों के प्रतिउत्तर, फिर चैनलों पर टीका टिप्पणियों वाले टॉक शो....., अखबार रंगे होंगे समाचारों से। आप सुबह अपने घर बैठे चाय की चुस्कियों का लुत्फ उठाते हुए उसे पढेंगे..गली-मोहल्ले, पान की दुकानों आदि पर गपशप करेंगे इन सब क्रियाकलापों की बातें..और रात घर आयेंगे चादर तान कर सो जायेंगे..या बहुत हुआ तो अपने विचार रख देंगे इस पर......। उफ्फ कितनी निरीह जनता.....। और इस जनता का में भी एक हिस्सा हूं...शर्म आती है। शर्म आती है नेताओं के हाथों की कठपुतली बनी जनता का नाच देखते हुए। &lt;br /&gt;क्रांति..........। क्यों हिम्मत नहीं होती न इस शब्द को साकार करने की? मुझमे भी नहीं है। इसलिये कि मैं भी आपकी तरह भारत के 21 वीं सदी का होनहार युवक हूं जिसे "ऐसा तो होता रहता है रोज़...", कह कर निकल जाने की आदत है। या " ऐसा नहीं होना चाहिये" जैसे विषयों पर खूबसूरती से बयान आदि देने की महारथ है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5618368231537832734-2211118020141580083?l=aasheeamitabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/2211118020141580083'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/2211118020141580083'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='है हिम्मत? नहीं न।'/><author><name>अमिताभ श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12224535816596336049</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_c0yASoeEE5k/TTxYDxYCgJI/AAAAAAAAAQ4/6oP9WOmKS8s/s220/28122010.jpg'/></author></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5618368231537832734.post-1555818157440844168</id><published>2009-06-23T10:16:00.000+05:30</published><updated>2009-06-23T10:17:57.424+05:30</updated><title type='text'>पप्पू की 'गिनीज बुक'</title><content type='html'>अपना एक दोस्त है, पप्पू. ये वो पप्पू नही जो पास हो जाता है. ये पप्पू तो कभी फेल हुआ ही नही.इसका उसे गर्व भी है. उसे ही नही, मुझे भी है. दरअसल अपना पप्पू कभी स्कूल गया नही और फेल पास के चक्कर मे पडा नही. मैने एक दिन उससे कहा भी था कि -यार पप्पू सरकार पढने-लिखने पर कितना जोर देती है और एक तू है कि पढता-लिखता भी नही? देख उसने एक नारा भी बनाया है कि ' पढना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो'. मेरा इतना कहना ही था कि उसने जवाब दिया- यार सरकार का क्या है, उसे करना ही क्या है, मेरा तो कहना ये है भाई कि मेहनत करना सीखो ओ पढने लिखने वालो.मै चुप रह गया, वैसे बात तो उसकी भी सही थी. ऐसे पप्पू की याद बरसो बाद आई तो उससे मिलने की उत्कंठा जाग्रत हो गई. जब से इस मुम्बई नगरी मे आया हू अपना शहर भूल गया हू. जब शहर भूला तो सारे यार-दोस्त भी भूल गया. मुम्बई की यही खासियत है कि यहां आप अपना सबकुछ भूल जाओ और सिर्फ अपने काम की फिक्र मे " अपना काम तमाम किये जाओ". खैर..../ पप्पू की याद आई, उसके जैसा दोस्त भी ढूंढे नही मिल सकता. सीधा-सादा, भोला-भाला. भला अब ऐसे दोस्त मिलते है? पप्पू की एक विशेषता है वो अपनी बात डंके की चोट पर कहता है, यह अलग बात है कि उसका 'डंका' ऐसी चोट खा-खा कर उसकी किस्मत की तरह पिचक गया है.किंतु वो अलमस्त ठहरा.&lt;br /&gt;सालो बाद उससे मुलाकात हुई. दुबली-पतली काया, सिर के बाल भगवान को प्यारे हो चुके थे, गोल चेहरा, छोटी छोटी आंखो मे झांकती चमक आज भी वैसी है जैसे पहले हुआ करती थी. मिलते ही उसने मुझे पहचान लिया, बोला- ओये लम्बू..कैसा है यार? मैने उससे गले मिलते हुये जवाब दिया- ठीक हू, तू बता क्या चल रहा है आजकल? उसने बडी मासूमियत से कहा- आजकल एक सोच मे उलझा हूं, अब तू मिल गया अच्छा हुआ, तुझे तो पता ही होगा.&lt;br /&gt;मैने पूछा- क्या पता है?&lt;br /&gt;यार बस यही कि ये गिनीज़ बुक क्या बला है, यार अपने को भी इसमे नाम लिखवाना है.पैसा-वैसा मिलता है ना इसमे?&lt;br /&gt;मैने कहा- गिनीज़ बुक? अबे ये रिकार्ड बनाने व तोड्ने वालो की है, इसमे दुनिया के एसे लोगो का नाम है जिन्होने अज़ूबे काम किये है, जो दुनिया मे दूसरे ना कर पाये. तू ऐसा कर सकता है क्या?&lt;br /&gt;पप्पू ने कहा- ओह तो ऐसा है...यार तब तो मेरा नाम इसमे होना ही चहिये.&lt;br /&gt;मैने सवाल किया- क्यो?&lt;br /&gt;उसने जवाब दिया- यदि दुनिया मे अज़ूबा ही इसमे शामिल हो सकता है तो मै भी अज़ूबा हूं. अपने मां-बाप की सेवा करता हूं. दुनिया मे आज ऐसा कोई करता है क्या?&lt;br /&gt;मै अवाक रह गया. सचमुच चुप रह गया. पप्पू की बात तो बिल्कुल सही थी. क्या कहता...&lt;br /&gt;फिर भी बोला- पप्पू, तू ठीक कहता है पर यार, इसमे ऐसा कुछ होना चाहिये जिसमे रोमांच हो, पागलपन हो, दीवानापन हो...लोगो को हैरत मे डाल दे.&lt;br /&gt;उसने कहा- सीधे सीधे बोल ना कि पागल लोगो की बुक है ये, तभी मै सोचूं कि अपने भारत के लोग क्युं इसमे ज्यादा नही है.&lt;br /&gt;उसकी इस बात ने भी मुझे उसके अपने देश के प्रति भोली स्वाभिमानता का दर्शन करा दिया.////&lt;br /&gt;इसके बाद पप्पू से बाते खूब हुई और बिछड्ने के बाद लगा कि वाकई पप्पू सा इंसान गिनीज् बुक क्या सिर आंखो पे बैठाने लायक है.../&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5618368231537832734-1555818157440844168?l=aasheeamitabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/feeds/1555818157440844168/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2009/06/blog-post_23.html#comment-form' title='18 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/1555818157440844168'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/1555818157440844168'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2009/06/blog-post_23.html' title='पप्पू की &apos;गिनीज बुक&apos;'/><author><name>अमिताभ श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12224535816596336049</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_c0yASoeEE5k/TTxYDxYCgJI/AAAAAAAAAQ4/6oP9WOmKS8s/s220/28122010.jpg'/></author><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5618368231537832734.post-5279492204648710889</id><published>2009-06-22T20:19:00.001+05:30</published><updated>2009-06-22T20:19:17.052+05:30</updated><title type='text'>असल साहित्य क्या है ?</title><content type='html'>इसमे कोई दो राय नही कि 'कहानी' साहित्य की खूबसूरत विधा है. किंतु 'कहानी' ही साहित्य है, यह हज़म हो जाने जैसा तो नही लगता. पिछले दिनो जब हम मित्र मंड्ली मे यह चर्चा चल रही थी और साहित्य के तथाकथित 'कार' राजेन्द्र यादव के सन्दर्भ मे बात करके अपना समय जाया कर रहे थे तो इस बीच मेरा गौतम राजरिशी जी के ब्लोग पर जाना हुआ, वहा भी मेने यही पाया कि राजेन्द्र जी मौज़ूद है/ लिहाज़ा मेरा मासूम मन साहित्य मे गद्य के प्रति विचारो की अग्नि मे तपने लगा/ 'जितना तपता सोना उतना निखरता है' वाला कथन सच ही है/गौतमजी के ब्लोग पर राजेन्द्र यादव के प्रति स्वस्थ आलोचना मन को भायी, स्वस्थ आलोचना साहित्य को तराशने का काम करती है/ हालांकि राजेन्द्रजी जैसे जीव का पाचन तंत्र कितना बलिष्ठ है इसका पता नही किंतु साहित्य के 'आका' कहलाने का उनका मोह 'हंस' मे दीखता है/ उनका साहित्य और साहित्य के लिये उठा पट्क वाला जो आभा मन्डल है वो उन लोगो की आंखे भले ही चौन्धीयाता रहे जिन्हे उनसे स्वार्थ हो, मेरी आंखो मे वे और उनका सहित्य कभी आकर्षण का पात्र नही बन सका। अपना अपना द्रष्टिकोण ठहरा. सौभाग्यवश मेरी उनसे कभी मुलाकात नही हुई, दुर्भाग्यावश मेने उनकी कुछ रचनाओ को पढा है। खैर जहा तक बात कहानी को ही साहित्य मानने की है तो मै इसे ठीक नही मानता। साहित्य की उपज राग से है, राग पध्य रूप मे ज्यादा स्पष्ट होता है। लिहाज़ा साहित्य का जन्म ही मै पध्य से हुआ मानता हू/ आप यदि गम्भीरता से विचार करे या साहित्य की मूल गहराई मे उतरे तो पहले काव्य के रूपो को जानने व समझने के लिये थोडा पाश्चात्य व भारतीय परम्परा को खंगाल लेना आवश्यक है। काव्य के भेदो मे यूरोपीय समीक्षको ने व्यक्ति और संसार को प्रथक करके काव्य के दो भेद किये है, एक विषयीगत दूसरा विषयागत. विषयीगत यानी सब्जेक्टिव, जिसमे कवि को प्रधानता मिलती है और दूसरा विषयागत यानी आब्जेक्टिव जिसमे कवि के अतिरिक्त शेष स्रष्टि को मुख्यता दी जाती है. यानी पहला प्रकार काव्य 'लिरिक' हुआ। यूनानी बाज़ा 'लाइर' से सम्बन्ध होने के कारण इसका शाब्दिक अर्थ तो वैणिक होता है किंतु इसे प्रायः प्रगति या भाव- प्रधान काव्य कहते है। इसमे गीत तत्व की प्रधानता रह्ती है. दूसरे प्रकार के काव्य को अनुक्रत या प्रक्थनात्मक कहा गया है। महाकाव्य और खंड काव्य इसके उपविभाग है. किंतु पाश्चात्य देशो मे प्रायः महाकाव्य ही इस प्रकार के काव्य का प्रतिनिधित्व करता है. वहा खंड काव्य जैसा कोई विशेष उपविभाग नही है. ये विभाग पध्य के ही है। अब यदि गध्य की बात करे तो इसके विभाजन मे गध्य काव्य की महिमा है. जहा भाव-प्रधान काव्य मिलेगा. और उपन्यास महाकाव्य का तथा कहानी खंड्काव्य का प्रतिनिधित्व करेगा/ गद्य मे निबन्ध, जीवनी आदि अनेक ऐसे रूप है जिनको इस विभाजन मे अच्छी तरह बान्ध नही सकते. पर गध्य काव्य के शेत्र से बाहर नही है। गद्य का उलट ही पद्य है. जिसको आप अंगरेज़ी मे (Verse) कहते है। आप जानते है कि भारतीय परम्परा मे नाटक को प्रधानता मिली है। जो काव्य अभिनीत होकर देखा जाये तो द्रष्य काव्य है और जो कानो से सुना जाये तो श्रव्य काव्य कहलाता है। यध्यपि श्रव्य काव्य पढे भी जाते है। रामायण का उदाहरण लिया जा सकता है जिसे पढने व गाने के लिये उपयुक्त माना जाता है। उपन्यास महाकाव्य का स्थानापन्न होकर और कहानी खन्डकाव्य के रूप मे गद्य के प्रबन्ध काव्य कहे जाते है। गद्य काव्य तो मुक्तक है ही, पत्र भी मुक्तक की कोटि मे आयेंगे. उनकी निबन्ध और जीवनी के बीच की सी स्थिति है। समस्त संग्रह की द्रष्टि से एक एक निबन्ध मुक्तक कहा जा सकता है। किंतु निबन्ध के भीतर एक बन्ध रहता है. ( हालांकि उनमे निजीपन व स्वछन्दता भी होती है) वैयक्तिक तत्व की द्रष्टि से गद्य के विभागो को इस प्रकार श्रेणी बद्ध कर सकते है, उपन्यास, कहानी ( काव्य के इस रूप मे उपन्यास की अपेक्षा काव्य तत्व और निजी द्रष्टिकोण अधिक रहता है.) जीवनी यह इतिहास और उपन्यास के बीच की चीज है। इसका नायक वास्तविक होने के कारण अधिक व्यक्तिपूर्ण होता है) निबन्ध (इसमे विषय की अपेक्षा भावना का आधिक्य रहता है) गद्य काव्य तो ये सभी रूप है। किंतु गद्य काव्य के नाम की विधा विशेष रूप से गद्य काव्य है। कहने का तात्पर्य यह है कि जो यह समझते है कि साहित्य कहानी या गद्य को ही कहा जाता है वे मेरी समझ मे ना समझ है। गद्य का जन्म ही कविता से हुआ है। मुझे अच्छा यह लगा कि गौतमजी न सिर्फ गज़ल या संस्मरण के महारथी है बल्कि वे वैचारिक स्तर पर साहित्य की परख करने से भी नही हिचकिचाते है। सम्भव है इसीलिये मुझे उनका ब्लोग रुचिकर लगता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5618368231537832734-5279492204648710889?l=aasheeamitabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/feeds/5279492204648710889/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2009/06/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/5279492204648710889'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/5279492204648710889'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='असल साहित्य क्या है ?'/><author><name>अमिताभ श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12224535816596336049</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_c0yASoeEE5k/TTxYDxYCgJI/AAAAAAAAAQ4/6oP9WOmKS8s/s220/28122010.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5618368231537832734.post-3358646323300336329</id><published>2009-04-06T23:57:00.002+05:30</published><updated>2009-04-07T00:10:37.477+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जानिए.'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सोचिये'/><title type='text'>गधा कौन?</title><content type='html'>एक गधे ने सोचा क्यों ना घोड़ा बन कर सब को बेवकूफ बनाऊ। बस फिर क्या था उसने अपना रूप घोडे जैसा बना लिया और दुनिया के सामने प्रकट हो गया। यहाँ उसे खूब प्रतिसाद मिला। वो भूल गया कि वो एक गधा है। उसका मान-सम्मान होने  लगा। एक दिन उसे घुड़दौड़ का आमंत्रण प्राप्त हुआ, इस घुड़दौड़ में उसे वरीयता दी गई।&lt;br /&gt;जब घुड़दौड़ प्रारम्भ हुई और उसकी पोल खुली तो सब उसे गालिया देने लगे। उसने सोचा उसकी क्या गलती है? उसने जो चाहा वो किया। गधा तो वो था ही, किन्तु जो उसे घोडा मान बैठे वो क्या है?&lt;br /&gt;जी हां , चुनाव फिर आया है, बहुत बकवास कर ली हमने। फलाना नेता बेकार है, फलां ऐसा है, वैसा है। बहुत बोल लिए। आखिर अब तक हम ही तो उन्हें सत्ताभोग दे रहे थे। गलती हमारी, और हम नेताओ को दोष दे? सोचिये गधा कौन है? घुड़दौड़ शुरू होने वाली है, पता भी चल गया है गधे का.... अब सही घोडे कि तलाश करे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5618368231537832734-3358646323300336329?l=aasheeamitabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/feeds/3358646323300336329/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2009/04/blog-post_06.html#comment-form' title='10 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/3358646323300336329'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/3358646323300336329'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2009/04/blog-post_06.html' title='गधा कौन?'/><author><name>अमिताभ श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12224535816596336049</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_c0yASoeEE5k/TTxYDxYCgJI/AAAAAAAAAQ4/6oP9WOmKS8s/s220/28122010.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-5618368231537832734.post-2647229530360402003</id><published>2009-04-05T23:40:00.000+05:30</published><updated>2009-04-05T23:58:38.522+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सवाल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चिंतन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विचार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उम्मीद'/><title type='text'>हम क्या है ?</title><content type='html'>चुनाव का समय है। समाचार पत्रों से लेकर तमाम तरहों की पत्रिकाओ तक चुनाव और उससे सम्बंधित टीका- टिप्पणियों का मानो बाज़ार छाया हो।  मेने पिछले १५ दिनों में कई पत्र-पत्रिकाओ में सिर्फ यही देखा कि लगभग हर कोई इस लोकतंत्र , नेताओ कि कार्य पध्दती आदि पर अपनी बाते कह रहा है। खासकर मज़ाक किया जा रहा है। ठीक है।  इसमें बुराई भी नहीं, क्योकि जो जैसा है उसके बारे में वैसा ही लिखा जा रहा है। किन्तु इस बार का उत्साह कुछ ज्यादा है। मेरे कुछ सवाल है॥ सोचिये और चिंतन कीजिये।&lt;br /&gt;क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि लेखको को मुद्दा चाहिए? और जब वो राजनीति जैसा हो तो बात ही क्या?&lt;br /&gt;क्या आप खुद अपनी लिखी गई बातो पर अमल करते है?&lt;br /&gt;देश कि चिंता क्या सिर्फ लिख कर ख़त्म हो जाती है?&lt;br /&gt;कितने बुध्धिजीवी वोट डालने जाते है?&lt;br /&gt;क्या बुराई का सामना मैदान में डट कर नहीं किया जा सकता?&lt;br /&gt;क्यों आप अच्छे  उम्मीदवार  को चुनाव नहीं लड़वा पाते?&lt;br /&gt;यदि कोई बेहतर उम्मीदवार नहीं दीखता तो क्या आपमें ताक़त है कि चुनाव लड़ लिया जाए?&lt;br /&gt;और यदि एसा कुछ भी नहीं है तो इस लोकतंत्र का मज़ाक बनाते रहना क्या खुद को जोकर जैसा साबित करना नहीं है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/5618368231537832734-2647229530360402003?l=aasheeamitabh.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/feeds/2647229530360402003/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2009/04/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/2647229530360402003'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/5618368231537832734/posts/default/2647229530360402003'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://aasheeamitabh.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='हम क्या है ?'/><author><name>अमिताभ श्रीवास्तव</name><uri>http://www.blogger.com/profile/12224535816596336049</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_c0yASoeEE5k/TTxYDxYCgJI/AAAAAAAAAQ4/6oP9WOmKS8s/s220/28122010.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry></feed>
